Saturday, August 12, 2017

१५ अगस्त : स्वतंत्रता दिवस

स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा


आजादी कहें या स्वतंत्रता ये ऐसा शब्द है जिसमें पूरा आसमान समाया है। आजादी एक स्वाभाविक भाव है या यूँ कहें कि आजादी की चाहत मनुष्य को ही नहीं जीव-जन्तु और वनस्पतियों में भी होती है। सदियों से भारत अंग्रेजों की दासता में था, उनके अत्याचार से जन-जन त्रस्त था। खुली फिजा में सांस लेने को बेचैन भारत में आजादी का पहला बिगुल 1857 में बजा किन्तु कुछ कारणों से हम गुलामी के बंधन से मुक्त नही हो सके। वास्तव में आजादी का संघर्ष तब अधिक हो गया जब बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि “स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है”।

अनेक क्रांतिकारियों और देशभक्तों के प्रयास तथा बलिदान से आजादी की गौरव गाथा लिखी गई है। यदि बीज को भी धरती में दबा दें तो वो धूप तथा हवा की चाहत में धरती से बाहर आ जाता है क्योंकि स्वतंत्रता जीवन का वरदान है। व्यक्ति को पराधीनता में चाहे कितना भी सुख प्राप्त हो किन्तु उसे वो आन्नद नही मिलता जो स्वतंत्रता में कष्ट उठाने पर भी मिल जाता है। तभी तो कहा गया है कि पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।

सत्यमेव जयते


जिस देश में चंद्रशेखर, भगत सिंह, राजगुरू, सुभाष चन्द्र, खुदिराम बोस, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारी तथा गाँधी, तिलक, पटेल, नेहरु, जैसे देशभकत मौजूद हों उस देश को गुलाम कौन रख सकता था। आखिर देशभक्तों के महत्वपूर्ण योगदान से 14 अगस्त की अर्धरात्री को अंग्रेजों की दासता एवं अत्याचार से हमें आजादी प्राप्त हुई थी। ये आजादी अमूल्य है क्योंकि इस आजादी में हमारे असंख्य भाई-बन्धुओं का संघर्ष, त्याग तथा बलिदान समाहित है। ये आजादी हमें उपहार में नही मिली है। वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद की गर्जना करते हुए अनेक वीर देशभक्त फांसी के फंदे पर झूल गए। 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला हत्याकांड, वो रक्त रंजित भूमि आज भी देश-भक्त नर-नारियों के बलिदान की गवाही दे रही है।

आजादी अपने साथ कई जिम्मेदारियां भी लाती है, हम सभी को जिसका ईमानदारी से निर्वाह करना चाहिए किन्तु क्या आज हम 66 वर्षों बाद भी आजादी की वास्तिवकता को समझकर उसका सम्मान कर रहे है? आलम तो ये है कि यदि स्कूलों तथा सरकारी दफ्तरों में 15 अगस्त न मनाया जाए और उस दिन छुट्टी न की जाए तो लोगों को याद भी न रहे कि स्वतंत्रता दिवस हमारा राष्ट्रीय त्योहार है जो हमारी जिंदगी के सबसे अहम् दिनों में से एक है ।

एक सर्वे के अनुसार ये पता चला कि आज के युवा को स्वतंत्रता के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी फिल्मों के माध्यम से मिलती है और दूसरे नम्बर पर स्कूल की किताबों से जिसे सिर्फ मनोरंजन या जानकारी ही समझता है। उसकी अहमियत को समझने में सक्षम नही है। ट्विटर और फेसबुक पर खुद को अपडेट करके और आर्थिक आजादी को ही वास्तिक आजादी समझ रहा है। वेलेंटाइन डे को स्वतंत्रता दिवस से भी बङे पर्व के रूप में मनाया जा रहा है।

इंकलाब जिंदाबाद
आज हम जिस खुली फिजा में सांस ले रहे हैं वो हमारे पूर्वजों के बलिदान और त्याग का परिणाम है। हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि मुश्किलों से मिली आजादी की रुह को समझें। आजादी के दिन तिरंगे के रंगो का अनोखा अनुभव महसूस करें इस पर्व को भी आजद भारत के जन्मदिवस के रूप में पूरे दिल से उत्साह के साथ मनाएं। स्वतंत्रता का मतलब केवल सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता न होकर एक वादे का भी निर्वाह करना है कि हम अपने देश को विकास की ऊँचाइयों तक ले जायेंगें। भारत की गरिमा और सम्मान को सदैव अपने से बढकर समझेगें। रविन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं से कलम को विराम देते हैं।

मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी
                           

हो चित्त जहाँ भय-शून्य, माथ हो उन्नत
हो ज्ञान जहाँ पर मुक्त, खुला यह जग हो
घर की दीवारें बने न कोई कारा
हो जहाँ सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का
हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की
हों नहीं रूढ़ियाँ रचती कोई मरुथल
पाये न सूखने इस विवेक की धारा
हो सदा विचारों ,कर्मों की गतो फलती
बातें हों सारी सोची और विचारी
हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें
बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा।

Friday, August 11, 2017

कालका मंदिर के स्थल पर प्रकट हुई थीं मां भगवती 'महाकाली'



अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात 'कालिका मंदिर' देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है। जहां नवरात्र में हजारों लोग माता का दर्शन करने पहुंचते हैं।

इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। माना जाता है कि हर काल में इसका स्वरूप बदला। मान्यता है कि इसी जगह आद्यशक्ति माता भगवती 'महाकाली' के रूप में प्रकट हुई और असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। मौजूदा मंदिर बाबा बालक नाथ ने स्थापित किया। उनके कहने पर मुगल सम्राज्य के कल्पित सरदार अकबर शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने इसी जगह शिवा (शक्ति) की अराधना की। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने काली की स्तुति की तो मां भगवती ने कहा कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

माना जाता है कि महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की। तब माता भगवती से उनका साक्षात्कार हुआ।

मंदिर की विशेषता

मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर के परिक्रमा में 36 मातृकाओं (हिन्दी वर्णमाला के अक्षर) के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। इसलिए दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला होता है।

नवरात्र मेले में घूमती है माता

आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों से पूजा होती है। नवरात्र में यहां मेला लगता है। रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मंदिर में अखंड दीप प्रज्जवलित है। पहली नवरात्र के दिन लोग मंदिर से माता की जोत अपने घर ले जाते हैं। नवरात्र में रात 2:30 बजे सुबह की व शाम की आरती सात बजे होती है। मान्यता है कि अष्टमी व नवमी को माता मेला में घूमती हैं। इसलिए अष्टमी के दिन सुबह की आरती के बाद कपाट खोल दिया जाता है। दो दिन आरती नहीं होती। दसवीं को आरती होती है।

Thursday, August 3, 2017

हनुमान जी को क्यों चढ़ाते है सिंदूर का चोला ?


हिन्दू धर्म में सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक सुहागन स्त्री इसे अपनी मांग में लगाती है। सिंदूर का हिन्दू धर्म में पूजा पाठ में भी महत्तव है।  कई देवी देवताओं को सिंदूर चढ़ाया जाता है। लेकिन  गणेश जी, भैरू जी (भैरव जी) और हनुमान जी को तो सिंदूर का पूरा चोला चढाने की परम्परा है। हर परम्परा के पीछे कोई कारण, कहानी जरूर होती है। हनुमान जी को भी ऊपर से नीचे तक सिंदूर चढाने के पीछे एक कहानी है जिसका वर्णन तुलसीदास जी ने भी रामचरित मानस में किया है।

रामचरित मानस के अनुसार जब राम जी लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या लौट आए तो एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही हैं। हनुमान जी ने उत्सुक हो माता सीता से पूछा यह क्या है जो आप मांग में सजा रही हैं। माता सीता ने कहा यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है। इसे मांग में सजाने से मुझे राम जी का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुन कर हनुमान जी से रहा न गया ओर उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया तथा मन ही मन विचार करने लगे इससे तो मेरे प्रभु श्रीराम की आयु ओर लम्बी हो जाएगी ओर वह मुझे अति स्नेह भी करेंगे। सिंदूर लगे हनुमान जी प्रभु राम जी की सभा में चले गए।
राम जी ने जब हनुमान को इस रुप में देखा तो हैरान रह गए। राम जी ने हनुमान से पूरे शरीर में सिंदूर लेपन करने का कारण पूछा तो हनुमान जी ने साफ-साफ कह दिया कि इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा। हनुमान जी की इस बात को सुनकर राम जी भाव विभोर हो गए और हनुमान जी को गले से लगा लिया। उस समय से ही हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है और सिंदूर अर्पित करने वाले पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं।
इसके अलावा हनुमानजी की प्रतिमा को सिंदूर का चोला चढ़ाने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। हनुमानजी को सिंदूर लगाने से प्रतिमा का संरक्षण होता है। इससे प्रतिमा किसी प्रकार से खंडित नहीं होती और लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। साथ ही चोला चढ़ाने से प्रतिमा की सुंदरता बढ़ती है, हनुमानजी का प्रतिबिंब साफ-साफ दिखाई देता है। जिससे भक्तों की आस्था और अधिक बढ़ती है तथा हनुमानजी का ध्यान लगाने में किसी भी श्रद्धालु को परेशानी नहीं होती।

रक्षा बंधन का महत्व

रक्षा बंधन का पर्व श्रवण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. वर्ष 2017 में यह 7 अगस्त, के दिन मनाया जायेगा. यह पर्व भाई -बहन के रिश्तों की अटूट डोर का प्रतीक है. भारतीय परम्पराओं का यह एक ऎसा पर्व है, जो केवल भाई बहन के स्नेह के साथ साथ हर सामाजिक संबन्ध को मजबूत करता है. इस लिये यह पर्व भाई-बहन को आपस में जोडने के साथ साथ सांस्कृ्तिक, सामाजिक महत्व भी रखता है.

रक्षा बंधन के महत्व को समझने के लिये सबसे पहले इसके अर्थ को समझना होगा. "रक्षाबंधन " रक्षा+बंधन दो शब्दों से मिलकर बना है. अर्थात एक ऎसा बंधन जो रक्षा का वचन लें. इस दिन भाई अपनी बहन को उसकी दायित्वों का वचन अपने ऊपर लेते है.


रक्षा बंधन की विशेषता 

रक्षा बंधन का पर्व विशेष रुप से भावनाओं और संवेदनाओं का पर्व है. एक ऎसा बंधन जो दो जनों को स्नेह की धागे से बांध ले. रक्षा बंधन को भाई - बहन तक ही सीमित रखना सही नहीं होगा. बल्कि ऎसा कोई भी बंधन जो किसी को भी बांध सकता है. भाई - बहन के रिश्तों की सीमाओं से आगे बढ़ते हुए यह बंधन आज गुरु का शिष्य को राखी बांधना, एक भाई का दूसरे भाई को, बहनों का आपस में राखी बांधना और दो मित्रों का एक-दूसरे को राखी बांधना, माता-पिता का संतान को राखी बांधना हो सकता है.

आज के परिपेक्ष्य में राखी केवल बहन का रिश्ता स्वीकारना नहीं है अपितु राखी का अर्थ है, जो यह श्रद्धा व विश्वास का धागा बांधता है. वह राखी बंधवाने वाले व्यक्ति के दायित्वों को स्वीकार करता है. उस रिश्ते को पूरी निष्ठा से निभाने की कोशिश करता है.

रक्षा बंधन आज के परिपेक्ष्य में

वर्तमान समाज में हम सब के सामने जो सामाजिक कुरीतियां सामने आ रही है. उन्हें दूर करने में रक्षा बंधन का पर्व सहयोगी हो सकता है. आज जब हम बुजुर्ग माता - पिता को सहारा ढूंढते हुए वृ्द्ध आश्रम जाते हुए देखते है, तो अपने विकास और उन्नति पर प्रश्न चिन्ह लगा हुआ पाते है. इस समस्या का समाधन राखी पर माता-पिता को राखी बांधना, पुत्र-पुत्री के द्वारा माता पिता की जीवन भर हर प्रकार के दायित्वों की जिम्मेदारी लेना हो सकता है. इस प्रकार समाज की इस मुख्य समस्या का सामाधान किया जा सकता है.

इस प्रकार रक्षा बंधन को केवल भाई बहन का पर्व न मानते हुए हम सभी को अपने विचारों के दायरे को विस्तृ्त करते हुए, विभिन्न संदर्भों में इसका महत्व समझना होगा. संक्षेप में इसे अपनत्व और प्यार के बंधन से रिश्तों को मजबूत करने का पर्व है. बंधन का यह तरीका ही भारतीय संस्कृ्ति को दुनिया की अन्य संस्कृ्तियों से अलग पहचान देता है.

रक्षा बंधन का आधुनिक महत्व

आज समय के साथ पर्व की शुभता में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि इसका महत्व ओर बढ गया है. आज के सीमित परिवारों में कई बार, घर में केवल दो बहने या दो भाई ही होते है, इस स्थिति में वे रक्षा बंधन के त्यौहार पर मासूस होते है कि वे रक्षा बंधन का पर्व किस प्रकार मनायेगें. उन्हें कौन राखी बांधेगा , या फिर वे किसे राखी बांधेगी. इस प्रकार कि स्थिति सामान्य रुप से हमारे आसपास देखी जा सकती है.

ऎसा नहीं है कि केवल भाई -बहन के रिश्तों को ही मजबूती या राखी की आवश्यकता होती है. जबकि बहन का बहन को और भाई का भाई को राखी बांधना एक दुसरे के करीब लाता है. उनके मध्य के मतभेद मिटाता है. आधुनिक युग में समय की कमी ने रिश्तों में एक अलग तरह की दूरी बना दी है. जिसमें एक दूसरे के लिये समय नहीं होता, इसके कारण परिवार के सदस्य भी आपस में बातचीत नहीं कर पाते है. संप्रेषण की कमी, मतभेदों को जन्म देती है. और गलतफहमियों को स्थान मिलता है.

अगर इस दिन बहन -बहन, भाई-भाई को राखी बांधता है तो इस प्रकार की समस्याओं से निपटा जा सकता है. यह पर्व सांप्रदायिकता और वर्ग-जाति की दिवार को गिराने में भी मुख्य भूमिका निभा सकता है. जरुरत है तो केवल एक कोशिश की.

एक धागा वृ्क्षों की रक्षा के लिये

आज जब हम रक्षा बंधन पर्व को एक नये रुप में मनाने की बात करते है, तो हमें समाज, परिवार और देश से भी परे आज जिसे बचाने की जरुरत है, वह सृ्ष्टि है, राखी के इस पावन पर्व पर हम सभी को एक जुड होकर यह संकल्प लें, राखी के दिन एक स्नेह की डोर एक वृक्ष को बांधे और उस वृ्क्ष की रक्षा का जिम्मेदारी अपने पूरे लें. वृ्क्षों को देवता मानकर पूजन करने मे मानव जाति का स्वार्थ निहित होता है. जो प्रकृ्ति आदिकाल से हमें निस्वार्थ भाव से केवल देती ही आ रही है, उसकी रक्षा के लिये भी हमें इस दिन कुछ करना चाहिए.

" हम्रारे शास्त्रों में कई जगह यह उल्लेखित है कि 
जो मानव वृ्क्षों को बचाता है, वृक्षों को लगाता है, 
वह दीर्घकाल तक स्वर्ग लोक में निवास पाकर 
भगवन इन्द्र के समान सुख भोगता है. " 
पेड -पौध बिना किसी भेदभाव के सभी प्रकार के वातावरण में स्वयं को अनुकुल रखते हुए, मनुष्य जाति को जीवन दे रहे होते है. इस धरा को बचाने के लिये राखी के दिन वृक्षों की रक्षा का संकल्प लेना, बेहद जरूरी हो गया है. आईये हम सब मिलकर राखी का एक धागा बांधकर एक वृ्क्ष की रक्षा का वचन लें.

copyrights:- http://bit.ly/2vnR6UC

Tuesday, August 1, 2017

शंकर जी द्वारा गणेश का और हाथी का सर काटने के कारण और परिणाम?

शिव जी ने एक न्याय का उदहारण दिया था जो समझने के बहुत आवश्यक है।।



जब गणेश का सर काटा गया उस समय गणेश ने अपनी माता के कहे अनुसार अपने कर्तव्य का पालन किया, परन्तु उस समय गणेश को अपनी क्षमता और शक्ति पर अहंकार था कि उसको माता शक्ति ने अपने शरीर के हल्दी चन्दन के अंश से बनाया तो जिस शक्ति और शिव के तप और संतुलन(मीज़ान) से आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर केन्द्रित रहती हैं वो सबसे बलशाली है और जब शंकर जी कैलाश आये तब शंकर जी को अपने अहंकार के वश में होने के कारणवश गणेश के द्वारा अभद्र व्यव्हार हुआ।। जो उस समय एक बहुत ही चिंता का विषय थी क्योंकि जो स्वयं में इतनी शक्ति का अलौकिक सूत्र होने के बाद भी अपने अहंकार के कारण शंकर के उस रूप को ना पहचानता हो तब नंदी और बाकी शिवगणों ने गणेश को शिव का रास्ता रोकने से मना किया तब भी गणेश ने अपने अहंकार के कारण रास्ते से हटने की बजाय शिवगणों को ये कहकर ललकारा था कि अगर आपमें शक्ति है तो मुझे हटाकर दिखाओ और गणेश से सभी शिवगणों को परास्त कर दिया था।। उसके पश्चात् इतने सारे शिवगणों को परास्त करने के कारण गणेश में अहंकार और बढ़ा, वे सोचने लगे कि जब इतने सारे शिव भक्त खुद सब मिलकर भी मुझे नहीं हटा पाए तो मुझसे बड़ा बलशाली और कोई नहीं।।

जिस कारण शंकर जी को गणेश का अहंकार तोड़ने हेतु उनसे युद्ध करना पड़ा और गणेश के धड़ से उनके सर को अलग करके उन्होंने ये बताया कि शक्ति के शरीर से जन्मा बालक तो बहुत बलशाली है किन्तु उसके अहंकार को नष्ट करना अतिआवश्यक है क्योंकि अहंकार सभी नाशों का जनक होता है।।

और जब पार्वती के पुनः अनुग्रह पर शंकर जी ने गणेश को पुनः जीवित करने का निर्णय इसलिए लिया था कि पार्वती एक पूर्ण स्त्री थीं।। उनमे स्त्रियों के सभी गुण और अवगुण थे।।

शंकर जी ने गणेश को जीवित करने के लिए हाथी का सर मंगाया, वो इसलिए कि हाथी का शरीर तो बड़ा होता है और साथ ही उसको अपने शरीर पर कभी अहंकार नहीं होता क्योंकि वो कभी खुद अपने शरीर की विशालता को नहीं देख पाता और उसकी आँखें छोटी होने के कारण बाकी श्रृष्टि उसको हमेशा द्रष्टि में बड़ी ही दिखाई देती हैं जो उसके अहंकारहीन होने का सबसे बड़ा कारण है।।

लेकिन अब सवाल ये था कि गणेश एक बालक है और गणेश को एक बालक का ही सर लगाया जा सकता है तो उन्होंने एक हाथी के बच्चे को लाने के लिए अपने गणों को भेजा और ये भी बताया कि जो नवजात हाथी अपनी माँ के पास लेटा हो पर उसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके लेटी हो उसी हाथी के सर को लाना है।। इससे हाथी की माँ को भी अपनी गलती का अहसास होगा जो आज भी एक मिसाल है कि माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर सोती है कभी पीठ करके नहीं सोती।। क्योंकि वो जानती है कि पीठ पीछे उसके बच्चे की रक्षा कौन करेगा।।

जब गणेश को हाथी का सर लगाया गया तब वो जीवित हुए और उनके शरीर पर हाथी का सर होने के साथ उनका अहंकार क्षीण हो गया और पार्वती के आग्रह पर सभी देवताओं ने उनको आशीर्वाद भी दिया कि वे सदैव अपने ऊपर अहंकार ना करें हमेशा ये सोचकर रहे कि उनके पास जितनी शक्तियां हैं वे सभी देवताओं के कारण हैं।।

तब से गणेश में कभी अहंकार नहीं आया।। और शिव ने गणेश के धड़ पर हाथी का सर लगाकर ये भी उदाहरण दे दिया कि कभी भी अहंकारी व्यक्ति कभी देव नहीं हो सकता।।

अब सवाल है कि वापस गणेश का ही सर क्यों नहीं लगाया?

यदि शंकर जी भी गणेश के शरीर पर उनका खुद ही सर लगाते तो अहंकार का नाश कैसे होता।।

हर उस अहंकारी को उसकी सज़ा मिलती है जो अपने अहंकार में चूर होकर दूसरों को कमजोर समझता है।।

अगर वे भी ऐसा ही करते तो उनमे और असुरों में क्या फर्क रह जाता।।

उसमे हाथी के बच्चे की गलती नहीं थी वो पार्वती के लिए ऐसा किया गया था।।

क्योंकि जब पार्वती बाहर आयीं थी तो उन्होंने जो बर्ताव किया था वो एक माँ के लिए सही नहीं था क्योंकि वे अपने पुत्र के अहंकार को उसकी मौत की वजह मानने की बजाय सभी शिव गणों को उसकी वजह बताकर कोस रही थीं कि उन्होंने एक बालक के साथ युद्ध किया जो कि शर्मनाक है कि इतने सारे शिवगण मिलकर एक बच्चे के साथ युद्ध किये।।

उन्होंने गणेश को जन्म तो दिया पर उनको ये ज्ञात करा नहीं पायीं कि जीवन में अपने अहंकार की बजाय दूसरों के साथ उचित व्यव्हार ही सही मार्ग है।।

हाथी के जिस बच्चे का सर मंगाया गया तभी शिव ने कहा था कि जो माँ अपने बच्चे की ओर पीठ करके सोई हो उसका ही सर लाना।। जिससे पार्वती को भी ये एहसास हो गया कि पुत्र को जन्म देने के बाद अनदेखा नहीं करना चाहिए बल्कि उसको उचित और अनुचित में अंतर समझाए और उसके समझदार होने तक खुद से अलग नहीं करना चाहिए।।

वो हाथी का बच्चा कोई आम नहीं था बल्कि एक समय एक व्यक्ति ने बरसों तपस्या करके ब्रम्हा जी से वरदान माँगा था कि वह संसार का सबसे बुद्धिमानी व्यक्ति हो, तब ब्रम्हा ने उन्हें वरदान दिया था, और समय आने पर उनको गणेश का स्थान मिला जिसको पार्वती ने बनाया था उसका तो अहंकार के कारण महादेव ने नाश कर ही दिया था और उस हाथी के बच्चे को गणेश का स्थान मिला था।।

जिसने अपनी शक्तियों पर अनुचित अहंकार किया उससे जग को खतरा उत्पन्न हुआ है, और महादेव ने अति होने पर उन शक्तियों का नाश किया है, चाहे वो पार्वती पुत्र ही क्यों ना हो।।

वो भगवन हैं पर अगर वे भी अनैतिक कार्य करने लगे तो उनमे और शैतान में क्या अंतर रह जाता।।

चमत्कार का अर्थ ये नहीं है कि कुछ करो चाहे वो गलत हो।।

सुर और असुर में कुछ अंतर है वो समझना होगा।।

जो व्यक्ति धर्म कार्यो मे ध्यान दे सात्विक भोजन ग्रहण करे दया हो अंदर वह सुर है
निर्दोष को सताये अभक्ष भोजन ग्रहण करे क्रूर क्रौधी असुर है।।

जैसा कि पोस्ट में है कि पार्वती पूर्ण स्त्री थीं उनमे सभी गुण और अवगुण थे।।

जिस कारण उनका शिव से मिलन हेतु कई बार जन्म हुआ।। सती पारवती सभी शक्ति के रूप हैं।।

आर्यसमाज एवं नास्तिको का पर्दाफाश
नास्तिको एवं आर्यसमाज का पर्दाफाश

Copywrite:- http://bit.ly/2whbS5q